हँसते ज़ख़्म: #BlogchatterA2Z

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H                  हम अक्सर दूसरों की मदद किया करते हैं| जब सब ठीक चल रहा होता है तो अनजाने ही ये मान बैठते हैं कि हमारे साथ तो कुछ ग़लत नहीं हो सकता| लेकिन जब समय हमारी परीक्षा लेना की तन लेता है तो बेबस होने के अलावा कुछ और कर पाना आसान नहीं होता |

कभी  डूबते  का  सहारा  हुआ  करते  थे,

पर  अपनी  ही  कश्ती  में  शायद  छेद  था;

सोचते  थे!  मुट्ठी  में  सारा  जहाँ  लिए  बैठे  हैं,

जाने  कब  फिसल  गया हाथों  से, वो  केवल  रेत था  ||

♥ ♥ ♥                                 doc2poet

आँसुओं की अहमियत और उनकी सार्थकता हमें तभी समझ में आती है जब विपरीत समय में ये आँसू ही हमारा सहारा बनते हैं |

आँसुओं  को  यूँ  बदनाम  न  कर,

के  मायूस  दिल  को  इन्हीं  से  क़रार  आता  है;

पलकों  के  बाँध  तले  छुपाते  है  हर  ग़म,

और  छलक  भर  जायें, तो  दिल  हल्का  हो  जाता  है ||

♥ ♥ ♥                          doc2poet

हर बार कोई आकर ये हाथ थाम ले तो इस दुनिया को कोई इतना निष्ठुर न कहे| कभी कभी हमें स्वयं अपना ही सहारा बनना पड़ता है |

मुद्दतें  बीती  ख़ुशियों  की  चाह  में,

के  हमने  ग़म  में  भी  मुस्कुराना  सीख  लिया;

मिला  ना  कांधा  भी  जब  इन  आँसुओं  को,

हमने  ख़ुद  को  ही  मनाना  सीख  लिया ||

♥ ♥ ♥                          doc2poet

अगर आपको मेरी कविताएँ पसन्द आयें तो मेरी पुस्तक “मन-मन्थन : एक काव्य संग्रह” ज़रूर पढ़ें| मुझे आपके प्यार का इन्तेज़ार रहेगा |

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32 thoughts on “हँसते ज़ख़्म: #BlogchatterA2Z

      1. आसान नहीं होता। पर जब करना पड़ता है तब सिर्फ एक क्षण लगता है करने |

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      2. सही कहा। जिसने कभी ऐसा किया हो, केवल वही यह बात कह सकता है । जब कोई राह न दिखे तो जहाँ तुम कदम बढ़ाओ वहीं तुम्हारी राह है।

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