परछाई : #BlogchatterA2Z

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             घड़ी के काँटों से इस दौड़ में अक्सर हम ख़ुद से ही आगे निकल जाते हैं | भूल जाते हैं कि हम कौन हैं, हम क्या चाहते हैं और इसी जद्दोजहत में अपनी परछाई से भी अजनबी हो जाते हैं |

ख़ुद  से  बिछड़े, जाने  कब  अरसा  हो  चला,

के  आज  अपना  ही  अक्स, यूँ  अन्जान  सा  क्यूँ  है ?

वो  मैं  ही  था, और  ये  भी  मैं  हूँ,

फिर  आईना  यूँ, परेशान  सा  क्यूँ  है ?

निकल  पड़े  थे, समय-की-लहरों  पर  होकर  सवार ,

फिर  देखकर  मंज़िल, धड़कानों  में  उफ़ान  सा  क्यूँ  है ?

के  ढल  ही  जाता  है  हर  शख़्स, वक़्त  के  इन  सांचों  में,

फिर  ख़ुद  से  अजनबी  हो  जाने  का, यूँ   इल्ज़ाम  सा  क्यूँ  है ?

शक्ल-ओ-सूरत  से  हम  मुख्तलिफ  न  सही,

फिर  ज़ह्न-ओ-दिल  इस  जिस्म  में, महमान  सा  क्यूँ  है ?

के  आज  भी  ये  दिल  नूर-ए-पाक़  सा  रोशन  है,

फिर  मिलकर  अपनी  ही  परछाई  से, यूँ  हैरान  सा  क्यूँ  है ?

यूँ  हैरान  सा  क्यूँ  है ??

♥ ♥ ♥                                 doc2poet

अगर आपको मेरी कविताएँ पसन्द आयें तो मेरी पुस्तक “मन-मन्थन : एक काव्य संग्रह” ज़रूर पढ़ें| मुझे आपके प्यार का इन्तेज़ार रहेगा |

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18 thoughts on “परछाई : #BlogchatterA2Z

  1. syncwithdeep

    P is for plethora of emotions. You may want to drop by here is the linkhttps://syncwithdeep.wordpress.com/2018/04/18/p-plethora-of-emotions-blogchattera2z-atozchallenge-atoz/

    Liked by 1 person

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