What Women face… : #HindiPoetry

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इतने क़ानून होते हुए भी अगर एक भी बच्ची की जान जाती है तो ये बड़े शर्म की बात है | #FemaleFoeticide

काँटों   के   शहर   में,

फूल   सी   मैं,

कोमल,  चंचल,  सौन्दर्या;

पर   उनकी   नज़र   में,

भूल   थी   मैं…||

***

                                           -doc2poet

मोहब्बत या जंग में जो भी जायज़ होता हो, पर किसी की ज़िंदगी इस तरह बर्बाद करना कभी जायज़ नहीं हो सकता | #AcidAttacks

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मेरे   निश्चय-अंगारों   को ,

तेज़ाब   कहाँ   बुझा   पाया ?

मैं   सुन्दर   थी, मैं  सुन्दर   हूँ;

ये   उनकी   ही   है   कायरता ,

जो   आईना   नहीं   छुपा   पाया ,

आईना   नहीं   छुपा   पाया…||

***

                                  -doc2poet

This post is dedicated to all the courageous women and girl children who face atrocities  like foeticide, acid attacks, criminal abortion etc. on a daily basis. Hope they get the strength to fight against all this. Hope this ends soon…

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भ्रूण हत्या: #BlogchatterA2Z

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B               लंबे समय से कवि सामाजिक मुद्दों को अपनी कविताओं में उजागर करते रहे हैं | आज समय कुछ और है पर कविताओं में गंभीर मुद्दों को आज भी देखा जा सकता है | भ्रूण हत्या नारी सशक्तिकरण में लगे सामाजिक कोढ़ का वह कीड़ा है जो  समय के साथ कमज़ोर होने की बजाय और भी प्रबल होता रहा है| नारी शक्ति पर मैनें कई अंश लिखे हैं पर ये पंक्तियाँ आपको सोचने पर ज़रूर मजबूर कर देंगी | आपने भी महसूस तो किया ही होगा कि हम श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर  कान्हा के साथ राधा को भी पूजते तो हैं, पर क्या हम उसे सुरक्षित जीवन दे पायें हैं…

उत्सव   हर  ओर,  है जगमग  मन  मन्दिर,

के इन गलियों  की  आज  भिन्न  सी  कुछ  आभा  है,

गूंजेगा  पलना  आज  स्वयँ  वासुदेव  की  किलकरी  से,

पर इस मोर पॅंख में तेज, आज कुछ कम  है, कुछ आधा है,

के बुझा दिया जिस कोख का दिया, समाज के इन रखवालों ने,

शायद उसी  कोख  में  राधा  है, उसी  कोख  में  राधा  है ||

♥ ♥ ♥                              -doc2poet 

अगर आपको मेरी कविता पसन्द आयें तो मेरी पुस्तक “मन-मन्थन : एक काव्य संग्रह” ज़रूर पढ़ें| मुझे आपके प्यार का इन्तेज़ार रहेगा |

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राधे-कृष्ण :#Poetry

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I remember this one from the TV series on Mahabharata…

यदा  यदा  हि  धर्मस्य  ग्लानिर्भवति  भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य  तदात्मानं  सृजाम्यहम्  ॥४-७॥

परित्राणाय  साधूनां  विनाशाय  च  दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय  सम्भवामि  युगे  युगे  ॥४-८॥

Translation:

Whenever and wherever there is a decline in religious practice, O descendant of Bharata, and a predominant rise of irreligion – at that time I descend Myself.

To deliver the pious and to annihilate the miscreants, as well as to reestablish the principles of religion, I Myself appear, millennium after millennium.

Here’s something for you to think upon…

उत्सव   हर  ओर  और  जगमग  मन  मन्दिर,

के   इन  गलियों  की  आज  भिन्न  सी  कुछ  आभा  है,

 गूंजेगा  पलना  आज  स्वयँ  वासुदेव  की  किलकरी  से,

पर इस मोर पॅंख में तेज आज कुछ कम सा है कुछ आधा है,

के  बुझा  दिया  जिस  कोख  का  दिया  समाज के इन रखवालों ने,

शायद उसी  कोख  में  राधा  है… उसी  कोख  में  राधा  है…||

                                           -doc2poet

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