सिस्कियाँ :#BlogchatterA2Z

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इन कविताओं में कई रंग हैं लेकिन कुछ गमगीन पल राज़ बनकर छुपे भी हैं | उन्हीं पलों को समर्पित कुछ पंक्तियाँ आपकी नज़र करता हूँ…

छलक  जाए  न  इस  दिल  से  कोई  ग़म,

के  अक्सर  यूँही  हँस  लिया  करता  हूँ;

टूट  जाता  था  जिन  पर  आँसुओं  का  बाँध,

उन  जज़्बात  को  कस  लिया  करता  हूँ;

नम-से  कुछ  लम्हे  क़ैद  हैं  इन  यादों  में,

 इनसे  उबर  जाने  को  तरस  लिया  करता  हूँ;

के  पढ़  ले  ना  कोई  मेरी  ये  खामोशियाँ,

हर  पल  बस   यही  अर्ज़ियाँ  करता  हूँ;

इन  खामोशियों  तले  कई  ज़ख़्म  भरने  को  हैं,

के  इनकी  मीठी  टीस  में  भी…रस  लिया  करता  हूँ;

ज़िंदगी  में  खुशियों  का  सूखा  न  पड़े  कभी,

यूँही  कभी  हँसी-कभी  अश्कों  में  बरस  लिया  करता  हूँ ||

♥ ♥ ♥                                   doc2poet

अगर आपको मेरी कविताएँ पसन्द आयें तो मेरी पुस्तक “मन-मन्थन : एक काव्य संग्रह” ज़रूर पढ़ें| मुझे आपके प्यार का इन्तेज़ार रहेगा |

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ख़ामोशी: #VoiceOfSilence

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 गमगीन पलों के सन्नाटे से उठता धुआँ…


छलक  जाए  न  इस  दिल  से  कोई  ग़म ,

के  अक्सर  यूँही  हँस  लिया  करता  हूँ ;

टूट  जाता  था  जिनपर  आँसुओं  का  बाँध ,

उन  जज़्बात  को  कस  लिया  करता  हूँ ;

के  नम-से  कुछ  लम्हे  क़ैद  हैं  इन  आँखों  में ,

काँपती  इन  पलकों  से  उन्हें  थाम  लिया  करता  हूँ ;

के  पढ़  ले  ना  कोई  मेरी  ये  खामोशियाँ ,

हर  पल  बस  यही  अर्ज़ियाँ  करता  हूँ ;

के  इन  खामोशियों  में  छिपे  कई  राज़  हैं ,

उठता  है  गुबार  तो  ख़ुद  से  ही  कह  दिया  करता  हूँ ;

के  मिलते  नहीं  अल्फ़ाज़  हर  जज़्बात  को  यहाँ ,

कुछ  बन  जाते  हैं  किस्से  तो  कुछ  बस  ग़म  दिया  करते  हैं ;

 बस  ग़म  दिया  करते  हैं ||

***

This post is a part of Write Over the Weekend, an initiative for Indian Bloggers by BlogAdda. This week’s WOW prompt is – ‘Voice Of Silence’.

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हँसते ज़ख़्म (3)

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गमगीन पलों के सन्नाटे से उठता धुआँ…

इन साँसों की बेशर्मी पे हैरां हूँ ,

के चलती ही रही… खुद ज़िंदगी को खोकर ;

चुकाई हर हँसी की कीमत, घंटों अंधेरों में रोकर ,

के जाने ये वक़्त… हर बार कैसे मात दे जाता है ;

खुद भी जलकर देख लिया, पर अंधेरा लौट ही आता है ||

♦ ♦ ♦

मुद्दतें बीती ख़ुशियों की चाह में ,

के हमने ग़म में भी मुस्कुराना सीख लिया  ;

मिला ना कांधा भी जब इन आँसुओं को ,

हमने ख़ुद को ही मनाना सीख लिया…||

♦ ♦ ♦

हँसते ज़ख़्म (2)

alone man

 गमगीन पलों के सन्नाटे से उठता धुआँ…

छलक जाए ना इस दिल से कोई ग़म , 

के अक्सर यूँही हंस लिया करता हूँ ;

 टूट जाता था जिनपर आँसुओं का बाँध ,

उन जज़्बात को कस लिया करता हूँ ;

 के ख़ौफ़ नहीं अब और किसी का ,

बस फिर से मरने से डरता हूँ…

 फिर से मरने से डरता हूँ ||

 ⊗ ⊗ ⊗

इन लम्हों की बेशर्मी पे हैरां हूँ,

के चलती रही साँसें…खुद ज़िंदगी को खोकर ;

चुकाई हर हँसी की कीमत,

घंटों अंधेरे में रोकर ;

जाने ये वक़्त कैसे हर बार मात दे जाता है,

के खुद भी जलकर देख लिया…पर अंधेरा लौट ही आता है ;

पर अंधेरा लौट ही आता है ||

 ⊗ ⊗ ⊗

हँसते ज़ख़्म (1)

alone man गमगीन पलों के सन्नाटे से उठता धुआँ…

उन्हें भूल पाना अब मुमकिन नहीं ,

के ये कोमल एहसास ही…साँसों का सहारा बन गया ;

साहिलों से नाता टूटे ज़माना हो चला,

के उफनते इस सागर में…ये तिनका ही किनारा  बन गया ||

⊗ ⊗ ⊗

कभी डूबते का सहारा हुआ करते थे,

पर अपनी ही कश्ती में शायद छेद था ;

सोचते थे…की मुट्ठी में सारा जहाँ लिए बैठे हैं,

जाने कब फिसल गया हाथों से…वो केवल रेत था ||

⊗ ⊗ ⊗

आँसुओं को यूँ बदनाम न कर,

के मायूस दिल को इन्हीं से क़रार आता है ;

पलकों के बाँध तले छुपाता है हर ग़म,

और छलक भर जायें…तो दिल हल्का हो जाता है ||

⊗ ⊗ ⊗