परछाई : #BlogchatterA2Z

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             घड़ी के काँटों से इस दौड़ में अक्सर हम ख़ुद से ही आगे निकल जाते हैं | भूल जाते हैं कि हम कौन हैं, हम क्या चाहते हैं और इसी जद्दोजहत में अपनी परछाई से भी अजनबी हो जाते हैं |

ख़ुद  से  बिछड़े, जाने  कब  अरसा  हो  चला,

के  आज  अपना  ही  अक्स, यूँ  अन्जान  सा  क्यूँ  है ?

वो  मैं  ही  था, और  ये  भी  मैं  हूँ,

फिर  आईना  यूँ, परेशान  सा  क्यूँ  है ?

निकल  पड़े  थे, समय-की-लहरों  पर  होकर  सवार ,

फिर  देखकर  मंज़िल, धड़कानों  में  उफ़ान  सा  क्यूँ  है ?

के  ढल  ही  जाता  है  हर  शख़्स, वक़्त  के  इन  सांचों  में,

फिर  ख़ुद  से  अजनबी  हो  जाने  का, यूँ   इल्ज़ाम  सा  क्यूँ  है ?

शक्ल-ओ-सूरत  से  हम  मुख्तलिफ  न  सही,

फिर  ज़ह्न-ओ-दिल  इस  जिस्म  में, महमान  सा  क्यूँ  है ?

के  आज  भी  ये  दिल  नूर-ए-पाक़  सा  रोशन  है,

फिर  मिलकर  अपनी  ही  परछाई  से, यूँ  हैरान  सा  क्यूँ  है ?

यूँ  हैरान  सा  क्यूँ  है ??

♥ ♥ ♥                                 doc2poet

अगर आपको मेरी कविताएँ पसन्द आयें तो मेरी पुस्तक “मन-मन्थन : एक काव्य संग्रह” ज़रूर पढ़ें| मुझे आपके प्यार का इन्तेज़ार रहेगा |

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अंतर्दर्शन: #SelfDiscovery

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 If you cannot find peace within yourself, you will never find it anywhere else. There was a time when I searched every nook and corner of my heart to look for answers, which I realized I knew already. You just have to quieten the mind and soul will speak for itself and reveal all its secrets. We often meet ourselves where we least expect it.

तैरने  चले  थे  दरिया  में, बीच  रस्ते  बरसात  हो  गयी,

के  ढूँढने  निकले  थे  ख़ुदा  को,  और  ख़ुद  से  मुलाक़ात  हो  गयी ||

                                          -doc2poet

                 Here are a few of the poems and couplets that churned out of my enlightened (only partially) mind.

मुकम्मल  जहाँ  की  तलाश  में,

फिरते  रहे  मारे-मारे ;

कैसे  मिले…जो  खोया  ही  नहीं,

हर  पल  पास  है  हमारे ; 

बस  आँखें  बंद  करने  की  देरी  है,

और  जी  उठेंगे  दिलकश  नज़ारे ;

के  लड़खड़ाते  ये  कदम  राह  ढूंड  ही  लेंगे,

कभी  यादों  की  भीड़  में…कभी  तन्हाई  के  सहारे ||

                                          -doc2poet

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सुनहरे  सपनों  की  आड़  में,
ज़िंदगी  के  रंगीन  पल, गुप-छुपकर  निकल  जाते  हैं ;

गिर  कर  उठना  तो  याद  रहता  है,
भूल  जाते  हैं…जब  लड़खडाकर  सम्भल  जाते  हैं ;

ये  पल  धुंधली  यादें  बनकर ,
होठों   पर  कभी  झिलमिलाते  हैं ;

और  कभी  आँसू  बनकर ,
आँखों  में  पिघल  आते  हैं ;

के  वक़्त  से  इस  कशमकश  में ,
दिल-ए-नादान  मुस्कुरा  ही  लेता  है ;

बस  खुशी  के  पैमाने  बदल  जाते  हैं…
खुशी  के  पैमाने  बदल  जाते  हैं ||

                                          -doc2poet

Here’s how Sant Kabira would have said this…

आपहु  मस्ती  काटिए,  हँसिए  और  हंसाए ;

चिंता  का  ऐनक  उतार  फेंक,  तो  जाग  सुंदर  हो  जाए ||

ऐसा  जीवन  हो  लाजवाब,  गर  सच  में  कोई  कर  पाए ;

सच्चा  साथी  है  मूल  मंत्र , जो  सच्ची  राह  दिखाए  ||

                                          -doc2poet

This post is written for Indispire Edition 148: Life is a journey of self discovery. Describe your journey till now or a part of your journey which brought to closer to a truth about life or closer to your soul and self-discovery.#SelfDiscovery