वक़्त : #BlogchatterA2Z

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      बहुत लोग शायद जानते न हों पर दिल्ली शहर हम सबकी सोच से पुराना है | अलग-अलग समय में इसे ७ बार बनाया गया है और उन सबके अवशेष आज भी हमारे बीच मौजूद हैं |

गुप्ता राजवंश द्वारा ४०० इ.पू. में क़ुतुब मीनार में लगाया गया मिश्रित धातु का खंबा आज भी ज़ंग से बचा हुआ है | तुघ्लक़ राजवंश का तुघ्लक़ाबाद का क़िला, इब्राहिम लोदी का लोदी गार्डेन, शेर शाह सूरी का पुराना किला, मुगलों का लाल किला और जामा मस्जिद और लुटियन दिल्ली से आज की हमारी नयी दिल्ली सभी अपने आप में एक मिसाल हैं |

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के   जिनके   क़लम-ओ-तलवार   ने   रचा   इतिहास   था,
बे-आबरू   हुए   वो   बिखरे   पन्नों   से   झाँकते   हैं,

अब   तेरी   मेरी   क्या   बिसात   ए   ग़ालिब,
के   मुघलिया   तख़्त   भी   यहाँ   धूल   फाँकते   हैं ||

♥ ♥ ♥                                    doc2poet

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सैंकड़ों   क़िस्से   दफ़्न   हैं   इस   मिट्टी   में,
ज़रा   कुरेदूँ   तो   अश्क    नज़र   आते   हैं,

वो   शान-ओ-शौक़त,   वो   राज-घराने   सब    धूमिल   हैं,
सिंघासन   पर   बैठने   वाले,  अब   फक़त   मुख्तसर   बातें   हैं ||

♥ ♥ ♥                                    doc2poet

अगर आपको मेरी कविताएँ पसन्द आयें तो मेरी पुस्तक “मन-मन्थन : एक काव्य संग्रह” ज़रूर पढ़ें| मुझे आपके प्यार का इन्तेज़ार रहेगा |

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परछाई : #BlogchatterA2Z

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             घड़ी के काँटों से इस दौड़ में अक्सर हम ख़ुद से ही आगे निकल जाते हैं | भूल जाते हैं कि हम कौन हैं, हम क्या चाहते हैं और इसी जद्दोजहत में अपनी परछाई से भी अजनबी हो जाते हैं |

ख़ुद  से  बिछड़े, जाने  कब  अरसा  हो  चला,

के  आज  अपना  ही  अक्स, यूँ  अन्जान  सा  क्यूँ  है ?

वो  मैं  ही  था, और  ये  भी  मैं  हूँ,

फिर  आईना  यूँ, परेशान  सा  क्यूँ  है ?

निकल  पड़े  थे, समय-की-लहरों  पर  होकर  सवार ,

फिर  देखकर  मंज़िल, धड़कानों  में  उफ़ान  सा  क्यूँ  है ?

के  ढल  ही  जाता  है  हर  शख़्स, वक़्त  के  इन  सांचों  में,

फिर  ख़ुद  से  अजनबी  हो  जाने  का, यूँ   इल्ज़ाम  सा  क्यूँ  है ?

शक्ल-ओ-सूरत  से  हम  मुख्तलिफ  न  सही,

फिर  ज़ह्न-ओ-दिल  इस  जिस्म  में, महमान  सा  क्यूँ  है ?

के  आज  भी  ये  दिल  नूर-ए-पाक़  सा  रोशन  है,

फिर  मिलकर  अपनी  ही  परछाई  से, यूँ  हैरान  सा  क्यूँ  है ?

यूँ  हैरान  सा  क्यूँ  है ??

♥ ♥ ♥                                 doc2poet

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इल्तजा: #BlogchatterA2Z

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I                   समय किसी के लिए नहीं रुकता और इसकी ये रफ़्तार कई कुर्बानी मांगती है | इससे आगे निकल पाना तो मुमकिन ही नहीं है | ऐसी स्थिति में हम केवल ज़िंदगी से ज़रा आहिस्ता चलने की इलतेजा ही कर सकते हैं और दुआ करते हैं के ऐसा सच में हो सके |

आहिस्ता  चल  ए  ज़िन्दगी,

कई  क़र्ज़  चुकाना  बाकी  है,

कुछ  दर्द  मिटाना  बाकी  है,

कुछ  फ़र्ज़  निभाना  बाकी  है,

रफ़्तार  में  तेरे  चलने  से,

कुछ  रूठ  गये , कुछ  छूट  गये,

उन  रूठों  को  मनाना  बाकी  है,

रोतों  को  हँसाना  बाकी  है,

इन  साँसों  पर  हक़  है  जिनका,

उनको  समझाना  बाकी  है,

कुछ  हसरतें  अभी  अधूरी  हैं,

कुछ  काम   अभी   ज़रूरी  हैं,

ख़्वाहिशें   घुट  गयीं  जो   दिल  में,

उनको  दफ़नाना  बाकी  है,

नई  राह  बनाना  बाकी  है,

कुछ  ख़्वाब  सजाना  बाकी  है,

कुछ  आँसू  हैं,  कुछ  ग़म  भी  हैं,

 के  मरहम  लगाना  बाकी  है,

कुछ  ज़ख़्म  छिपाना  बाकी  है,

कुछ  और  सबक  हैं  दामन  में  तेरे,

उनसे  मिल  जाना  बाकी  है,

तू  आगे  चल  मैं  आता  हूँ,

बस   कदम  बढ़ाना  बाकी  है,

के  आहिस्ता  चल  ए  ज़िंदगी,

कुछ  क़र्ज़  चुकाना  बाकी  है,

कुछ  क़र्ज़  चुकाना  बाकी  है ||

♥ ♥ ♥                                  doc2poet

अगर आपको मेरी कविताएँ पसन्द आयें तो मेरी पुस्तक “मन-मन्थन : एक काव्य संग्रह” ज़रूर पढ़ें| मुझे आपके प्यार का इन्तेज़ार रहेगा |

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बहुत देर हो चुकी शायद…

It-is-too-late-now
Source here

It  is  never  too  late…


आहिस्ता  चल  ए  ज़िन्दगी , कुछ क़र्ज़   चुकाना  बाकी  है,

कुछ  दर्द  मिटाना  बाकी  है, कुछ  फ़र्ज़  निभाना  बाकी  है,

रफ़्तार  में  तेरे  चलने  से, कुछ  रूठ  गये – कुछ  छूट  गये,

उन  रूठों  को  मनाना  बाकी  है, रोतों  को  हँसाना  बाकी  है,

इन  साँसों  पर  हक़  है  जिनका, उनको  समझाना  बाकी  है,

कुछ  हसरतें  अभी  अधूरी  हैं, कुछ  काम  और  अभी   ज़रूरी  हैं,

ख़्वाहिशें  कुछ  घुट  गयी  इस  दिल  में, उनको  दफ़नाना  बाकी  है,

नई  ख्वाहिशें  जगाना  बाकी  है, कुछ  ख़्वाब  सजाना  बाकी  है,

कुछ  आँसू  हैं  तो  कुछ  ग़म  भी  हैं, उनको  हँसी  तले  दबाना  बाकी  है,

कहीं  मरहम  लगाना  बाकी  है, कुछ  ज़ख़्म  छिपाना  बाकी  है,

तू  आगे  चल  मैं  आता  हूँ, के  अभी  कदम  बढ़ाना  बाकी  है ,

कुछ  और  सबक  हैं  तेरे  दामन  में, उनसे  मिल  जाना  बाकी  है,

के  वक़्त  से  इस  दौड़  में, उम्मीदें  तो  बस  अभागी  हैं,

घड़ी  के  काँटे  कभी  रुका  करते  नहीं, इन्हें  पकड़  पाना  अभी  बाकी  है,

बहुत देर हो चुकी शायद, पर ख़्वाब अभी कुछ बाकी हैं, 

के  आहिस्ता  चल  ए  ज़िंदगी, कुछ  क़र्ज़  चुकाना  बाकी  है ||

***

This post is a part of Write Over the Weekend, an initiative for Indian Bloggers by BlogAdda. Although this is an old composition but I think it falls perfectly for this prompt, hope you like it:-)

माँ: #RaceAgainstTime

silhouette of mother and child
http://www.browniephotography.com

If I had a time machine, I would change that one moment when it all happened…


कुछ  धुँधली  हैं  कुछ  मीठी  सी, कुछ  खुशियाँ  तो  कुछ  आँसू  ही  सही,

के  यादों  के  असीम  सागर  मे  मैं  तन्हा  तो  हूँ  पर  अकेला  नहीं,

कुछ  छूट  गया  पीछे  शायद, कदम  रुके  तो  पर  राहें  चलती  रही,

के  वक़्त  से  कब  साँसें  जीत  पाई  हैं, मन  विचलित  हो  या  धीमहि,

होता  गर  वक़्त  मेरे  भी  इशारों  पर, छीन  लाता  वो  पल  जो  हासिल  नहीं,

पर  खिलती  है   इन  अंधेरों  में  ही  रोशनी, है  कहा  किसी  ने  सही,

के  वक़्त  की  इन  दरारों  में, मेरा  भी  हाफ़िज़  है  कहीं,

यूँही  भटकते  गुमनाम  अंधेरों  में, शायद  मिल  जाऊँ  उनसे  कहीं,

वो  उनकी  गोद  में  रखना  सर, वो  हर  बात  जो  उन्होंने  कही,

वो  बालाएँ, वो  डाँट, वो  शगुन  की  मीठी  दही,

कुछ  याद  ऩहीँ  कुछ  भूल  गया, के  सुनाता  हूँ  दास्तान  ये  अनकही,

हर  मुश्किल  का  हल  है  इन  यादों  में, के  प्यारी  मेरी  माँ  बसती  है  यहीं,

के  उनकी  यादों  की  छाँव  तले, अकेला  होकर  भी  मैं  तनहा  नहीं,

के  वक़्त  बेशक  जीत  जाए  पर  हार  मैने  भी  मानी  नहीं,

अकेला  होकर  भी  मैं  तनहा  नहीं…

***

This post is a part of Write Over the Weekend, an initiative for Indian Bloggers by BlogAdda. This week’s WOW prompt is – ‘If I Had A Time Machine’.

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